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मोती रत्न

मोती रत्न की प्राकृतिक उपलब्‍धता:

मोती रत्न समुद्र में सीपियों द्वारा बनाया जाता है। इस कारण इसकी उपलब्‍धता मुश्किल और कम होती है। अच्‍छी गुणवत्‍ता का मोती बहुत मूल्‍यवान और कम ही पाए जाते हैं। ये सफेद चमकदार और कई आकार में होते हैं लेकिन गोल मोती ही सबसे उत्‍कृष्‍ट माना जाता है और यही खरीदा और बेचा जाता है।

वर्तमान में मोतियों का कल्‍चर भी शुरू हो गया है। समुद्र से सीपियों को पालकर उन्‍हें ऐसी अवस्‍था में रखते हैं कि उनमें मोतियों का प्रोडक्‍शन हो सके। इस प्रक्रिया को ‘पर्ल कल्‍चर’ कहते हैं। इस प्रकार तैयार मोती असली मोतियों की श्र‍ेणियों में ही आते हैं। सभी रत्‍नों में मोती ऐसा रत्‍न है जिसका फैशन इंडस्‍ट्री में बहुत इस्‍तेमाल किया जाता है।

विज्ञान और मोती रत्न:

वैज्ञानिक रूप से मोती कै‍ल्शियम कार्बोनेट है जो कि अपनी सबसे छोटी क्रिस्‍टेलाइन अवस्‍था में मोती के रूप में पाया जाता है।

कृत्रिम मोती

ज्‍योतिष शास्‍त्र के साथ-साथ मोती का इस्‍तेमाल साजोश्रृंगार में भी किया जाता है। इसलिए बाजार में इसकी मांग बहुत है। अधिक मांग होने के कारण बाजार में नकली मोती भी उपलब्‍ध होते हैं। नकली या कृत्रिम मोती प्‍लास्‍टिक और कांच आदि की सहायता से तैयार किया जाता है।

मोती रत्न के गुण:

प्राचीन गाथाओं के अनुसार शुद्ध मोती तारे के जैसे चमकता है। ज्‍योतिष में एकदम गोल मोती को सबसे श्रेष्‍ठ मानते हैं। इसमें न तो कोई रेखा होती हैं और न ही इन पर किसी किए हुए काम के निशान होते हैं। यह ज्ञान को बढ़ाने वाला व धन प्रदान करने वाला रत्‍न है। चंद्रमा का रत्‍न व्‍यक्ति के व्‍यवहार को शांत करता है। निर्बलता को दूर कर चेहरे पर कांति लाता है।

 

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ज्‍योतिष और मोती रत्न के लाभ

मोती चंद्रमा का रत्‍न है इसलिए जिसकी जन्‍मकुंडली में चंद्रमा क्षीण, दुर्बल या पीडि़त हो उन्‍हें मोती अवश्‍य धारण करना चाहिए। निम्‍न परिस्‍थ‍ितियों में इसे ग्रहण करें:

  1. यदि जन्‍मकुंडली में सूर्य के साथ चंद्रमा उपस्थित हो तो वह क्षीण होता है। इसके अलावा सूर्य से अगली पांच राशियों के पहले स्थित होने पर भी चंद्रमा क्षीण होता है। ऐसी स्थिति में मोती धारण करना चाहिए।
  2. केंद्र में चंद्रमा हो तो उसे कम प्रभाव वाला या अप्रभावी मानते हैं। ऐसे में केंद्र में चंद्रमा होने पर भी मोती पहनना चाहिए।
  3. दूसरे भाव अर्थात धन भाव का स्‍वामी यदि चंद्रमा हो तो यह कुंडली मिथुन लग्‍न में होगी। ऐसे में अगर चंद्रमा छठे भाव में बैठा हो तो मोती धारण करना बहुत उत्‍तम होता है।
  4. जन्‍मकुंडली में अगर चंद्रमा पंचमेश होतर बारहवें भाव में हो या सप्‍तमेश होकर दूसरे भाव में हो, नवमेश होकर चतुर्थ भाव में हो, दशमेश होकर पंचम भाव में हो तथा एकादशेश होकर षष्‍ठम भाव में स्थित हो तो ऐसे व्‍यक्ति को यथाशीघ्र मोती धारण कर लेना चाहिए।
  5. किसी भी कुंडली में अगर चंद्रमा वृश्‍चिक राशि का हो तो इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता कि वो किस भाव में है। ऐसे जातक को बिना विलंब मोती धारण करना चाहिए।
  6. इसी प्रकार चंद्रमा छठें, आठवें और बारहवें भाव में हो तो भी मोती धारण कर लेना चाहिए।
  7. यदि चंद्रमा राहू, केतु, शनि और मंगल के साथ बैठा हो या इनकी दृष्‍टि चंद्रमा पर हो तो भी मोती धारण करना चंद्रमा के अच्‍छे फल देता है।
  8. चंद्रमा जिस भाव का स्‍वामी हो उससे छठे या आठवें स्‍थान में अगर वह स्‍थ‍ित हो तो भी मोती धारण करना चाहिए।
  9. अगर चंद्रमा नीच का हो, वक्री हो या अस्‍तगत हो, इसके अलावा चंद्रमा के साथ राहू के ग्रहण योग बना रहा हो तो भी मोती धारण कर लेना चाहिए।
  10. यदि विंशोत्‍तरी पद्धति से चंद्रमा की महादशा या अंतर्दशा चल रही हो तो ऐसे व्‍यक्‍ति को भी मोती पहन लेना चाहिए।

मोती रत्न का प्रयोग:

मोती को 2, 4, 6 या 11 रत्‍ती का धारण करना चाहिए। इसे चांदी की अंगूठी में धारण करना चाहिए। इसके बाद किसी शुक्‍ल पक्ष के सोमवार को विधिनुसार उपासनादि करके तथा 11000 बार ऊं सों सोमाय: नम: मंत्र जाप करके संध्‍या के समय इसे धारण करना चाहिए।

मोती रत्न का विकल्‍प

मोती की उपलब्‍धता और शुद्ध मोती के बहुत महंगा होने के कारण इसके बदले चंद्रकांत मणि या सफेद पुखराज धारण किया जा सकता है। इस बात का विशेष ध्‍यान रखना चाहिए कि मोती और उसके विकल्‍प के साथ हीरा, पन्‍ना, गोमेद, नीलम और लहसुनिया कभी धारण नहीं करना चाहिए।

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सावधानी

मोती क्रय करते समय दो बातों का विशेष ध्‍यान रखना चाहिए पहला कहीं वो नकली न हो और दूसरा मोती पहनने की जो शर्ते हैं उन्‍हें पूरा किया जाए। असली और नकली रत्‍नों की पहचान करना बहुत मुश्‍किल है इसलिए महंगे रत्‍नों को सिर्फ अच्‍छी जगह से लें और उनके सर्टिफिकेट देखकर ही लें।

दूसरी बात की मोती के साथ हीरा, पन्‍ना, नीलम, गोमेद और लहसुनिया न पहनें।